जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : राज्य के मुखिया रघुवर दास ने शनिवार की सुबह
अपने विधानसभा क्षेत्र के बिरसानगर स्थित जोन नंबर एक, दो, तीन के मध्य
विद्यालय का औचक निरीक्षण किया। इस दौरान वे स्कूलों में गंदगी देख भड़क
उठे।
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पाटन के पारा शिक्षक को बर्खास्त करने की मांग
राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय के पारा शिक्षक वीरेंद्र को बर्खास्त करने
की मांग को लेकर ग्रामीणों ने बैठक की। इसकी अध्यक्षता पाटन बीईईओ सुमन
अग्रवाल ने की।
कंप्यूटर तो खरीद लिए पर शिक्षक का पता नहीं
एकओर जहां पूरे देश को डिजिटलाइजेशन व्यवस्था से जोड़ने की तैयारी चल रही है
और कंप्यूटर साक्षरता पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जगन्नाथपुर के
मध्य विद्यालयों में कंप्यूटर शिक्षा की स्थिति बेहद खराब है। इन स्कूलों
में 15 कंप्यूटर तो उपलब्ध करा दिया गया है, लेकिन शिक्षक का अता- पता नहीं
है।
शिक्षकों ने फूंका राज्य निदेशक का पुतला
हजारीबाग : पिछले 25 दिनों से हड़ताल पर चल रहे और सरकार द्वारा कोई सुध
नहीं लेने से नाराज हड़ताली शिक्षकों व कर्मियों ने मंगलवार को जिला परिषद
चौक पर आइटीआइ निदेशक का पुतला फूंककर विरोध जताया। वहीं सरकार के खिलाफ
नारेबाजी करते हुए शिक्षकों की समस्या को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
समाप्त हो एेच्छिक विषय की अनिवार्यता : बाबूलाल
रांची: झाविमो अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने हाइस्कूल शिक्षक नियुक्ति
परीक्षा में एेच्छिक विषय की अनिवार्यता समाप्त करते हुए नये सिरे से
विज्ञापन जारी करने का आग्रह किया है.
अब मनचाहे जिले में ट्रांसफर करा सकेंगे सहायक शिक्षक
वर्ष2015-16 में कक्षा एक से आठ तक नियुक्त सहायक शिक्षक अब अपने मनचाहे
जिले में स्थानांतरण करा सकते हैं। इसके लिए प्राथमिक शिक्षा निदेशक मीना
ठाकुर ने जिला शिक्षा अधीक्षक से वैसे सहायक शिक्षकों की सूची मांगी है।
शिक्षा निदेशक ने जिला शिक्षा अधीक्षक से दस दिनों के अंदर सूची की मांग की
है।
पारा शिक्षकों के स्थानांतरण सूची में हो संशोधन
कांडी: झारखंड प्रदेश पारा शिक्षक संघ की कांडी प्रखंड इकाई के अध्यक्ष
रामरंजन के नेतृत्व में पारा शिक्षकों का एक शिष्टमंडल बीडीओ गुलाम समदानी
से मिला। इस दौरान प्रखंड के 26 पारा शिक्षकों की मनमानी तरीके से की गई
पदस्थापना की शिकायत करते हुए इसमें संशोधन की मांग की।
पारा शिक्षकों के स्थानांतरण सूची में हो संशोधन
कांडी: झारखंड प्रदेश पारा शिक्षक संघ की कांडी प्रखंड इकाई के अध्यक्ष
रामरंजन के नेतृत्व में पारा शिक्षकों का एक शिष्टमंडल बीडीओ गुलाम समदानी
से मिला। इस दौरान प्रखंड के 26 पारा शिक्षकों की मनमानी तरीके से की गई
पदस्थापना की शिकायत करते हुए इसमें संशोधन की मांग की।
काला बिल्ला लगाकर बच्चों को पढ़ाएंगे पारा शिक्षक
रांची : अपनी मांगों को लेकर राज्य सरकार पर उदासीनता का आरोप लगाते हुए
पारा शिक्षकों ने एक बार फिर आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया है।
शिक्षक बनने का सुनहरा मौका… 63 हजार पगार… ऐसे करें आवेदन
शिक्षकों के लिए नौकरी का सुनहरा मौका है. तेलंगाना स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन यानि कि TSPSC ने भारी संख्या में भर्तियां निकाली है. आवेदन प्रकिया 30 अक्टूबर से शुरू होगी और अंतिम तारीख 30 नवंबर, 2017 है.
दिसंबर तक करें शिक्षकों का अंतर जिला स्थानांतरण
रांची : झारखंड प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष संजय
कुमार महतो ने विभाग से शिक्षकों के अंतर जिला स्थानांतरण की प्रक्रिया
दिसंबर तक पूरी करने की मांग की है़
एरियर भुगतान नहीं होने से प्रा. शिक्षकों में रोष
रांची| रांचीजिले के प्राथमिक शिक्षकों को दीपावली में सातवें वेतनमान का
एरियर भुगतान नहीं हुआ। इसके लिए शिक्षकों ने जिला कोषागार को जिम्मेवार
ठहराया है।
सरकारी कर्मियों का डीए एक फीसदी बढ़ा, पेंशन भी बढ़ेगी
राज्य कर्मियों को सरकार ने दीपावली का तोहफा दिया है। बुधवार को कैबिनेट की
बैठक में सरकारी सेवकों को 1 जुलाई के ही प्रभाव से डीए की नई किस्त देने
और वेतन आयोग की सिफारिश के हिसाब से पेंशन दिए जाने को मंजूरी मिल गई।
हाईस्कूल शिक्षक नियुक्ति परीक्षा विवाद सुप्रीमकोर्ट पहुंचा
झारखंड में हाईस्कूल शिक्षक नियुक्ति परीक्षा में विषय बाध्यता को लेकर उठा विवाद सुप्रीमकोर्ट
पहुंच गया है. सुप्रीमकोर्ट में छात्रों की याचिका स्वीकार किए जाने से
उत्साहित छात्रों ने आयोग से इस परीक्षा को तत्काल स्थगित करने की मांग की
है.
नैक की तरह अब सीबीएसई भी करेगा स्कूलों की ग्रेडिंग
वेंकटेश्वर राव, जमशेदपुर। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने
स्कूलों की मनमानी पर नकेल कसने की तैयारी कर ली है। इसके तहत स्कूलों का
एक्रीडिटेशन किया जाएगा। यह एक्रीडिटेशन इस मायने में खास होगा कि स्कूलों
को बेहतर ग्रेड पाने के लिए काफी मशक्कत करनी होगी।
नहीं बनाई बायोमैट्रिक हाजिरी, सिंहभूम कॉलेज के शिक्षक- कर्मचारियों का वेतन रुका
कोल्हान विश्वविद्यालय के अंगीभूत महाविद्यालय सिंहभूम कॉलेज चांडिल में
सेवा देने वाले शिक्षक व शिक्षकेतर कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला। विवि
की ओर से दीपावली व छठ के मद्देनजर सभी अंगीभूत कॉलेजों व विवि कर्मचारियों
को सितंबर का वेतन निर्गत कर दिया गया।
चार महीने से नहीं मिला है उर्दू शिक्षकों को वेतन
जिले के प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में कार्यरत उर्दू शिक्षकों को चार
महीने से वेतन का भुगतान नहीं हुआ है। वेतन नहीं मिलने के कारण उर्दू
शिक्षकों में आक्रोश देखा जा रहा है। वेतन के लिए आवंटन नहीं होने के कारण
जून 2017 के बाद वेतन का भुगतान नहीं हुआ है।
JPSC जेएसएससी ने शिक्षक नियुक्ति परीक्षा के लिए जारी किया एडमिट कार्ड
झारखंड में आगामी 29 अक्टूबर से 6 चरणों में होने वाले हाईस्कूल शिक्षक
नियुक्ति परीक्षा के लिए जेएसएससी ने एडमिट कार्ड जारी कर दिया है. आयोग ने
परीक्षा स्थगित करने की मांग को अनसुनी करते हुए 29 अक्टूबर से 2 दिसंबर
तक रांची समेत विभिन्न जिलों में परीक्षा आयोजित करने का फैसला किया है.
पारा शिक्षकाे काे मिलेगा एक माह का मानेदय
जामताड़ा| झारखंडप्रदेश पारा शिक्षक महासंघ जिला जामताड़ा का एक
प्रतिनिधिमंडल डीएसई की उपस्थिति में जिला कर्मियों से मिलकर मानदेय से
संबंधी वार्ता किया।
सुनवाई पूरी होने के बाद हो शिक्षक नियुक्ति परीक्षा : संघ
रांची | हाईस्कूलशिक्षक नियुक्ति परीक्षा मामले की सुप्रीम कोर्ट में
सुनवाई चल रही है। इस नियुक्ति परीक्षा का आयोजन झारखंड कर्मचारी चयन आयोग
के माध्यम से किया जाना है।
आठवीं बोर्ड परीक्षा में पूछे जाएंगे ऑब्जेक्टिव और लघु उत्तरीय प्रश्न
रांची।झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) द्वारा राज्य में 8वीं बोर्ड की परीक्षा नेशनल एचीवमेंट सर्वे (नैस) के पैटर्न पर होगी। इससे बोर्ड एग्जाम के पैटर्न को लेकर ऊहापोह की स्थिति समाप्त हो गई है।
CBSE दो शिफ्ट में लेगा 10th-12th की परीक्षा
हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा को लेकर सीबीएसई जल्द ही एक बड़ा फैसला ले सकता है. इस सत्र से हाईस्कूल और इंटर की परीक्षाएं अब दो पाली में कराई जा सकती हैं.
झारखंड संयुक्त हाइस्कूल शिक्षक प्रतियोगिता परीक्षा के मामले की हुई सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को झारखंड संयुक्त हाइस्कूल शिक्षक
प्रतियोगिता परीक्षा के मामले की सुनवाई हुई। जस्टिस मदन बी लोकुर व जस्टिस
दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस
जारी करने का निर्देश दिया।
हाईस्कूल शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा
रांची | हाईस्कूलशिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली
याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर
जवाब मांगा है।
समय पर मानदेय भुगतान की मांग को लेकर पारा शिक्षकों का धरना
जागरण संवाददाता,चास: झारखंड प्रदेश पारा शिक्षक महासंघ ने पांच सूत्री
मांगों के समर्थन में उपायुक्त कार्यालय के समक्ष जिलाध्यक्ष नारायण माहथा
की अध्यक्षता में धरना दिया। पारा शिक्षकों की मांगों का समर्थन मुखिया
संघ के अध्यक्ष मंतोष सोरेन ने भी किया है।
जाली सर्टिफिकेट पर नौकरी कर रहे 100 पारा शिक्षक
जालीसर्टिफिकेट पर कार्यरत 100 पारा शिक्षकों की अंतिम रूप से पहचान कर ली
गई है। अब तक की यह सबसे बड़ी कार्रवाई समझी जा रही है। फाइल तैयार कर अंतिम
मुहर के लिए डीसी के पास भेजी गई है।
मानदेय के लिए डीएसई से मिले पारा शिक्षक
गिरिडीह | पाराशिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष नारायण महतो की अगुआयी में एक
शिष्टमंडल शनिवार को जिला शिक्षा अधीक्षक कमला सिंह से मिलकर बकाया मानदेय
की मांग की।
प्राथमिक शिक्षकों की भूख हड़ताल 23 अक्तूबर से
गोड्डा : झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ जिला इकाई की एक बैठक कार्यालय
में जिला सचिव मनोज कुमार की अध्यक्षता में की गयी. जिला सचिव ने कहा कि
निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी को डीडीओ पद से मुक्त करने के लिए विभाग के
पदाधिकारी को ज्ञापन दिया गया था.
आठ लाख शिक्षकों की हैप्पी होगी दिवाली, सरकार ने दिया 7वें वेतन आयोग का तोहफा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों
के शिक्षकों को दिवाली तोहफा दिया है। इन शिक्षकों को सातवें वेतन आयोग का
लाभ दिया जाएगा। इन संस्थानों में काम करने वाले करीब आठ लाख से ज्यादा
शिक्षकों और दूसरे कर्मचारियों को अब हर महीने 22 से 28 फीसद तक बढ़ा हुआ
वेतन मिलेगा।
'क्या आप उच्च शिक्षा के हाल से चिंतित है?' रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
उच्च शिक्षा की हालत ख़राब नहीं है, उनकी ख़राब है जो उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज गए. छात्रों को एक जगह जमा कर बर्बाद करने का प्रोजेक्ट सरकारें ही चला सकती हैं.
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'क्या आप उच्च शिक्षा के हाल से चिंतित है?' रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
सैलरी तो बढ़ी है मगर समस्या उससे भी बड़ी हैं, हम सातवें वेतन आयोग के लागू होने की भी बात करेंगे मगर पहले जो कर रहे थे, करते रहेंगे. उच्च शिक्षा की हालत ख़राब नहीं है, उनकी ख़राब है जो उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज गए, एडमिशन फीस दी, 3-4 साल वहां बिताया फिर भी इस बात से फर्क नहीं पड़ा कि क्लास रूम में पढ़ाने के लिए कोई प्रोफेसर नहीं आया. वे डिग्री का इंतज़ार करते रहे, प्रोफेसर का किया ही नहीं. जो प्रोफसर बचे हुए हैं उनमें से कई बहुत अच्छा पढ़ाते हैं, कई राजनीतिक दलों का झोला ढोते हैं और कइयों को पढ़ाने ही नहीं आता है.
जिस मुल्क में किसी को भी वाइस चांसलर बना दिया जाता हो, वहां सिर्फ योग्यता के आधार पर प्रोफेसरों की नियुक्ति का भरोसा इतनी आसानी से पैदा नहीं हो सकता है. कुछ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर पढ़ा रहे हैं, उन्हीं पर बोझ डालने के नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं ताकि नए प्रोफेसर रखने की ज़रूरत न पड़े और जहां ज़रूरत से बचना मुश्किल है, वहां एडहॉक रखने के फैसले हो रहे हैं. हमारे सहयोगी दिनेश मानसेरा ने रिपोर्ट भेजी है कि उत्तराखंड मंत्रिमंडल ने परमानेंट प्रोफसरों की बहाली की जगह ठेके पर लेक्चरर रखे जाने का फैसला किया है. 15 दिन पहले लोक सेवा आयोग को लिखा गया था कि 797 पद भरने की प्रक्रिया शुरू हो मगर 11 अक्टूबर के दिन फैसला पलट गया और अब 585 लेक्चरर ठेके पर रखे जाएंगे.
चार साल से टिन शेड में चल रहा यह कॉलेज उत्तराखंड के चम्पावत ज़िले के बनबसा शहर का है. अस्पताल के स्टॉफ क्वार्टर के कैंपस में टिन शेड के नीचे चल रहा है कॉलेज. कॉलेज के पास न तो अपनी इमारत है न अपना शौचालय. छात्र अस्पताल के शौचालय का ही इस्तमाल करते हैं. इस टिन शेड में छह विषयों की पढ़ाई के लिए पांच टीचर हैं. यह इलाके का एकमात्र कॉलेज है. पढ़ाई कैसे होती होगी इसकी फिक्र न तो पढ़ने वालों को होगी और न पढ़ाने वालों को. कोई सवाल नहीं कर रहा, सब अपना समय काट रहे हैं. इस कॉलेज में सवा सौ छात्र अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं, उनका जीवन कहीं और बर्बाद न हो और उसकी ज़िम्मेदारी किसी और न पर आ जाए, इसलिए सरकार टिन शेड में यह कॉलेज चला रही है. जो छात्र यहां नहीं बर्बाद होना चाहते वो यहां से दूसरे शहर के कॉलेजों में चले गए हैं जहां के कॉलेजों की हालत का अनुमान आप लगा सकते हैं. इसलिए राज्य सरकार ने तय किया है कि जो 585 लेक्चरर ठेके पर रखे जाएंगे उन्हें 500 रुपया प्रति घंटा पर पढ़ाना होगा. वे चाहे कितना भी घंटा पढ़ा लें मगर महीने में उन्हें 25000 से अधिक नहीं मिलेगा. इसे अधिकतम न्यूनतम कहते हैं यानी जो मिनिमम है वही अधिकतम. राज्य में राज मिस्त्री की भी दिहाड़ी 500 है और राजकीय कॉलेज के शिक्षा मिस्त्री की दिहाड़ी भी 500 रुपये हैं. ये उदारवादी सिस्टम का समाजवाद है.
आप भी सोच रहे होंगे कि हम टनकपुर से सटे बनबसा कैसे पहुंच गए, दरअसल फेसबुक पर एक पाठक ने हमें पहुंचा दिया. कई बार लगता है कि समाज ने ही उच्च शिक्षा को छोड़ दिया है. जब लेक्चरर-प्रोफेसर के बग़ैर ही हिन्दुस्तान भर के करोड़ों छात्र पास होते रहे हैं तो क्यों न कॉलेज सिस्टम ही बंद कर दिया जाए और शहर के एक बड़े मैदान में हर महीने की पांच तारीख को जितने छात्र समा जाएं, उन सबको उनकी पसंद के विषय में पास घोषित कर दिया जाए. इससे तो न तो प्रोफेसर रखने का झंझट होगा न ही वाइस चांसलर और शिक्षा मंत्री. हम इस सीरीज़ के दौरान एक ऐसे समाज की हालत देख रहे हैं जो देखी नहीं जा रही है. मगर सोचिए इस हालत को हमारा समाज कितने आराम से देखता आ रहा है. जैसे वो मानता है कि आत्मा भले अमर न हो, कॉलेजों की यह हालत अमर ज़रूर है.
लेकिन फलोदी के जयनारायण मोहन लाल पुरोहित राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय की इमारत बनाने वाले ने ऐसा नहीं सोचा. इस कॉलेज की इमारत तो शानदार है मगर शानदार इमारत में भी हमारी व्यवस्थाएं अपनी निशानी छोड़ देती हैं. मुंबई जाकर कामयाबी हासिल करने वाले हेमचंद पुरोहित को लगा कि उनके इलाके में कॉलेज की अच्छी इमारत होनी चाहिए तो अपनी जेब से 5 करोड़ लगाकर इमारत बना दी. कितने अरमान से उन्होंने पांच करोड़ लगाकर आधुनिक सुविधाओं वाले पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज का निर्माण करा दिया मगर यहां पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं. 16 लेक्चरर-प्रोफेसर होने चाहिए मगर हैं सिर्फ तीन. 27 कर्मचारी होने चाहिए थे मगर 7 ही हैं. 30-30 किलोमीटर से छात्र यहां एमए करने आते हैं. करीब 2000 छात्रों के नामांकन के बाद भी यहां टीचर नहीं है. 1900 छात्रों को एक जगह जमा कर बर्बाद करने का प्रोजेक्ट सरकारें ही चला सकती हैं. 2011 में यह कॉलेज बना कर सरकार को दे दिया गया था.
राजस्थान में एक नए सिस्टम का पता चला है. दूसरे ज़िलों के परमानेंट शिक्षकों में से ही किसी को एक-एक महीने के लिए भेज कर यहां पढ़ाई होती है, कभी नहीं होती है. सोचिए मुंबई के सेठ हेमचंद पुरोहित ने क्या-क्या सपने देखे होंगे जब उन्होंने पांच करोड़ लगाकर यह इमारत बनवाई होगी. वे चाहते तो इतने में अपनी ज़मीन पर कॉलेज बनवाकर मुनाफा कमा सकते थे, मगर ऐसे कम ही होते हैं जो सरकार को इमारत बनवा कर देते हैं. उन्होंने बस इतना चाहा कि उनके पिता का नाम रह जाए इसलिए इस कॉलेज का नाम है हेमचंद जय नारायण पुरोहित महाविद्यालय, अगर सरकार ने भरोसा नहीं तोड़ा होता तो हेमचंद जैसे कितने ही उद्योगपति आगे आते और कॉलेज बना कर अपने ज़िले या गांव के नाम पर दे देते, जैसा कि पहले भी लोग करते रहे हैं. हेमचंद जी न सिर्फ इस कॉलेज के लिए 100 बीघा ज़मीन दान दी, बल्कि दस बीघा ज़मीन में बिल्डिंग बनाकर भी दिया.
राजस्थान से चलते हैं अब झारखंड. रांची यूनिवर्सिटी का हाल लेते हैं. 12 जुलाई, 1960 से रांची यूनिवर्सटी चल रही है. आज इसके तहत 64 कॉलेज हैं. 23 पोस्ट ग्रेजुएट विभाग हैं. दो लाख छात्र हैं, नौजवानों की इतनी जागरूक आबादी जिस यूनिवर्सटी में हो, वहां तो लोकतंत्र और व्यवस्थाओं के चाल-चलन में स्वर्ण युग ही आ जाना चाहिए. मगर रांची यूनिवर्सिटी के छात्र भी, लगता है कि क्लास में प्रोफेसर का नहीं, तीन साल बाद किसी तरह डिग्री का इंतज़ार करते रह जाते हैं.
यहां के खाली पदों पर सीधे बहाली होनी चाहिए थी मगर 1982 के बाद से हुई ही नहीं. आप 21वीं सदी में जा रहे हैं, रांची यूनिवर्सिटी 20वीं सदी में ही फंसी पड़ी है. एसिस्टेंट प्रोफेसर प्रमोशन पाकर एसोसिएट प्रोफसर फिर प्रोफसर बन कर रिटायर होते गए, सीटें खाली होती गईं . यहां कांट्रेक्ट पर टीचर रखे जाते हैं. रिसर्च स्कॉलर क्लास लेते हैं. प्रोफेसरों को प्रशासनिक काम करने होते हैं क्योंकि इन कामों के लिए नॉन टीचिंग स्टाफ की भर्ती नहीं होती है. मुझे इस बात पर शक है कि बहुत से छात्रों को पता है कि उनके प्रोफेसर को पढ़ाने के लिए पढ़ना भी पढ़ता है. न प्रोफेसर बताते हैं और न छात्र पूछते हैं. सबको लगता है कि प्रोफेसर कंप्यूटर हैं, ऑन कर दो, पढ़ाना चालू, इसलिए इनसे एडमिशन भी कराओ, मंत्री का स्वागत भी कराओ और निबंध लेखन प्रतियोगिता का इंचार्ज भी बनाओ.
रांची यूनिवर्सिटी का यह रामलखन सिंह यादव कॉलेज है. कोकर इलाके में यह कॉलेज है, 100 कट्ठा ज़मीन पर बना है. 80 के दशक से ही कॉलेज की ज़मीन को लेकर न्यायिक विवाद चल रहा है. यह कॉलेज हमारी न्यायिक प्रक्रिया की भी मिसाल है. 40 साल में यह मुकदमा अंजाम पर नहीं पहुंचा है. कॉलेज में भी किसी ने सक्रियता नहीं दिखाई. सुप्रीम कोर्ट के स्टे के कारण यहां पर नया निर्माण नहीं हो सकता है. यहां पर इंटर से लेकर ग्रेजुएशन के 9500 छात्र पढ़ते हैं. च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम लागू होने के बाद हर विषय में शिक्षकों की ज़रूरत बढ़ गई है. इस वक्त किसी भी विषय के लिए एक या दो से ज़्यादा लेक्चरर नहीं हैं. नए सिस्टम के हिसाब से इस कॉलेज को 150 के करीब शिक्षक चाहिए मगर पुराने सिस्टम के हिसाब से 38 ही हैं. इतिहास में 300 छात्रों ने एडमिशन लिया है मगर टीचर एक ही हैं. कॉमर्स में आठ सौ छात्र हैं, मगर पढ़ाने के लिए मात्र 3 टीचर हैं. हालत यह है कि शिक्षक क्लास ले या इम्तहान ले या कापी चेक करे. तीन-तीन, चार-चार महीना परीक्षा होती है और फिर कापी चेक होती हैं. शिक्षक कहते हैं कि फिर भी हम लोग पढ़ा लेते हैं, मगर आप समझ सकते हैं कि क्या पढ़ाई होती होगी.
इस कॉलेज में रांची के आस-पास के ग्रामीण इलाके से बच्चे पढ़ने आते हैं. एक छात्र तो यहां 40 किमी से रोज़ साइकिल चलाकर आता है मगर सिस्टम उसे रोज़ फेल करता होगा. एक शिक्षक ने बताया कि इस दबाव से निपटने के लिए हमने खास तरह से रूटीन बनाया है ताकि किसी वक्त एक हज़ार से अधिक छात्र कैंपस में न हो. आईआईएम अहमबादाबाद के प्रोफेसर को रामलखन सिंह यादव कॉलेज पर एक अध्ययन करना चाहिए. यह कॉलेज मुख्यमंत्री के आवास से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर है मगर सरकार की निगाह से एक लाख प्रकाश वर्ष दूर है. रामलखन सिंह यादव बिहार के दबंग नेता हुए थे, इनके नाम पर कई जगहों पर कॉलेज है.
हमारे मुल्क में मात्र 200 करोड़ की मूर्ति बनाने पर विवाद हो गया. इसका मुझे दुख है. मांग यह होनी चाहिए था कि राम की मूर्ति बन रही है तो 200 की जगह 20,000 करोड़ की लागत से बननी चाहिए. ताकि दुनिया को पता चले कि हम भारत के नौजवानों के लिए कॉलेज भले न बना सके, जो बने हुए हैं, उन्हें भले न बचा सके, मगर मूर्ति हम चाह लें तो बनाकर रहेंगे. हमारे युवा अब क्लास रूप में पढ़कर पास नहीं होंगे, वे टीवी चैनल के सामने इन विषयों पर डिबेट देखते हुए एजुकेटेड हो रहे हैं. रामलखन सिंह यादव कॉलेज के प्रिंसिपल साहब की बात सही है, आखिर वे क्या कर सकते हैं, जब कोई कुछ कर ही नहीं रहा है वे क्या कर सकते हैं.
हमारे सहयोगी हरबंस और मनोज ने दुमका के एक कॉलेज का हाल भेजा है. ये एक अलग यूनिवर्सिटी है. सिदो कान्हु मुर्मू यूनिवर्सिटी. इस यूनिवर्सिटी में दुमका, देवघर, गोड्डा, जामताड़ा, पाकुड़और साहेबगंज के 13 महाविद्यालय आते हैं.
1855 में सिदो कान्हु ने अंग्रेज़ी हुकूमत और साहूकारों के अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की थी. 30 जून, 1855 की रात साहेबगंज ज़िला के भोगनडील गांव में 10 हज़ार से अधिक संथाल जमा हुए थे. सिदो मुर्मू और कान्हु मूर्मु ने उस रात आज़ादी का ऐलान कर दिया. इनकी ज़ुड़वां बहनें चांद और भैरव भी शहीद हो गई थीं. 1857 से पहले का यह संथाल विद्रोह इतिहास का एक निर्णायक पन्ना है. चार भाई-बहनों के शहीद होने का किस्सा काश ज़माने तक पहुंचता मगर सिदो और कान्हु के नाम पर बनी यूनिवर्सिटी की हालत भी ठीक नहीं है. इस यूनिवर्सिटी में 55 हज़ार छात्रों का भविष्य उज्जवल होने का इंतज़ार कर रहा है. इस यूनिवर्सटी में 476 अस्सिटेंट प्रोफेसर होने चाहिए मगर 288 ही हैं. 188 पद रिक्त हैं. रीडर के 34 पद होने चाहिए मगर एक भी रीडर नहीं है. यहां के 13 महाविद्यालयों में से सिर्फ एक के पास प्रिंसिपल होने का सौभाग्य प्राप्त हैं. बाकी 12 कॉलेज में प्रिंसिपल भी नहीं हैं.
छात्र और छात्राओं को एक बात समझ आ गई है. यूनिवर्सिटी का मतलब परीक्षा देना और पास कर जाना है. इस सीरीज़ के दौरान कई जगहों के छात्रों और प्रोफसरों ने फोन पर बताया कि एक ही काम है जो चल रहा है. इम्तहान का फार्म भराना और इम्तहान कराना. इसके अलावा सब काम बंद हैं. हर कॉलेज में प्रिंसिपल और यूनिवर्सिटी में वीसी का कमरा और आफिस चमकता हुआ मिलेगा. वहां गमले ज़रूर मिलेंगे. पढ़ाई बर्बाद कर, पर्यावरण की रक्षा करते हुए. शिक्षक जानते हैं कि हकीकत क्या है, इसलिए दावा भी नहीं कर पाते हैं. यह बात सही है. जब पढ़ाने वाला होगा ही नहीं तो जो बचा हुआ है वो कैसे सारा पढ़ा देगा.
झारखंड के दो विश्वविद्यालयों का हाल हमने देखा. अब उत्तरी छोटानागपुर के विनोबा भावे यूनिवर्सिटी का हाल बताते हुए गर्व सा महसूस हो रहा है. यही कि हमारे आज के नेताओं ने याद करने के मामले में किसी भी नेता को नहीं छोड़ा. जिसे भी याद किया है उनकी निशानी देखकर याद के नाम से ही रूह कांप उठती है. अब कुछ हो किसी की स्मृति में कुछ भी न बने.
इस यूनिवर्सिटी में भी 70 प्रतिशत शिक्षकों की कमी बताई जा रही है. मात्र 30 प्रतिशत बचे हुए शिक्षकों के भरोसे यह यूनिवर्सिटी टल रही है. छात्र शिकायत करते हैं, शिकायत सुन ली जाती है. हमारे देश में कार्रवाई भले न हो, सुनवाई हो जाती है. अब तो बहुत से लोग सुनवाई को ही कार्रवाई समझ कर अपना धरना अगले धरने तक के लिए स्थगित कर देते हैं. जो शिक्षक बचे हुए हैं उन्हें कॉलेज के प्रशासन का काम भी करना होता है. पढ़ाई का काम भले ही रुक जाए, प्रशासन का काम नहीं रुकना चाहिए. भारत की जनता इसी यकीन में सोती है कि शासन का प्रशासन चल रहा है. बाकी अस्पताल, स्कूल चले न चले, क्या फर्क पड़ता है. यूनिवर्सिटी में अब इस बात को लेकर उम्मीद जगी है कि 9 साल बाद प्रोफेसरों की बहाली की कवायद शुरू हो रही है. किसी को पता नहीं कि क्या 70 फीसदी बहाली होगी, मगर बहाली होने जा रही है यही सुनकर उम्मीदों के बादल छा गए हैं. प्रोफेसर के आने का अनुमान मौसम विभाग के अनुमान जैसा हो गया हैं.
भारत दुनिया का अकेला देश होगा जहां नहीं पढ़ाने के लिए इतने कॉलेज खोले गए हैं. इस हालात में आपको रेटिंग नाम के झुंझने से धोखा दिया जाता है कि भारत में भी दुनिया की तरह रेटिंग शुरू हो गई है. अब कॉलेजों की रैंकिंग होगी. इस सीरीज़ के दौरान यह भी समझ आ रहा है कि कॉलेजों की ग्रेडिंग के लिए नेशनल एक्रिडेशन काउंसिल (नैक) का सिस्टम भी नाकाफी और नाकाम है.
सूरत की एक शिक्षिका ने कहा कि हमारे शहर में नैक की टीम आती है तो उन्हें साड़ी और मिठाई का डिब्बा देकर भेजना होता है. कई जगहों पर नैक की टीम अच्छा काम भी कर जाती है. पर नैक और रेटिंग से क्या होगा, क्या आपको पता चलेगा कि फलां कॉलेज में 70 फीसदी प्रोफेसर नहीं हैं. हज़ार से लेकर दस दस हज़ार छात्रों का भविष्य एडमिशन फीस लेकर बर्बाद किया जा रहा है. मगर यह मसला ज़रूरी नहीं है. मूर्ति बननी चाहिए. सुना है नेता लोग ज़हर पीने लगे हैं. भारत के लाखों-करोड़ों छात्रों ने यूनिवर्सिटी में जाकर जो अमृत पिया है, उसने हमारी व्यवस्थाओं के साहस को अमर कर दिया है और छात्रों को जर्जर. यह पंक्ति तभी समझ आएगी जब आप इसे चार बार पढ़ेंगे और पांच बार सुनेंगे.
यूनिवर्सटी के शिक्षकों के लिए एक खुशी की खबर है. ऐसा नहीं है कि ख़राब सिस्टम में खुशियां नहीं आती हैं. आती हैं और आती रहेंगी. प्रोफेसरों के जीवन में सातवें वेतन आयोग का आगमन हुआ है, बधाई. सेंट्रेल यूनिवर्सिटी, स्टेट यूनिवर्सटी और एडेड कॉलेज के शिक्षकों का वेतन बढ़ा है. इस घोषणा से पता चला कि भारत में 7 लाख, 58 हज़ार प्रोफेसर हैं. काश यह भी पता चल जाता कि भारत में कितने लाख प्रोफेसर नहीं हैं.
सैलरी ज़रूरी है, क्योंकि जो बचे हुए प्रोफेसर-लेक्चरर हैं, पढ़ाने के लिए काफी मेहनत करते हैं, खासकर हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी में तो देखा है, हमारे टीचर हमें पढ़ाने के लिए घर पर 5-5 घंटे रोज़ पढ़ कर आते थे. तब हमें पहली बार पता चला था कि पढ़ाने के लिए पढ़ना भी पड़ता है. जो नहीं पढ़ाते हैं वो प्रिंसिपल या सत्तारूढ़ दल का ज़रूरी काम करते हैं. वो भी राष्ट्र निर्माण का ही काम है. छात्र निर्माण से भी बड़ा काम है राष्ट्र निर्माण. उम्मीद है ख़ाली पदों पर भी एक प्रेस कांफ्रेंस होगी. जिसमें बताया जाएगा कि बहाली की प्रक्रिया कैसे पारदर्शी होगी. सत्तारूढ़ दल का झोला उठाने वालों की नहीं, पढ़ने वालों को नौकरी मिलेगी.
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'क्या आप उच्च शिक्षा के हाल से चिंतित है?' रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
सैलरी तो बढ़ी है मगर समस्या उससे भी बड़ी हैं, हम सातवें वेतन आयोग के लागू होने की भी बात करेंगे मगर पहले जो कर रहे थे, करते रहेंगे. उच्च शिक्षा की हालत ख़राब नहीं है, उनकी ख़राब है जो उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज गए, एडमिशन फीस दी, 3-4 साल वहां बिताया फिर भी इस बात से फर्क नहीं पड़ा कि क्लास रूम में पढ़ाने के लिए कोई प्रोफेसर नहीं आया. वे डिग्री का इंतज़ार करते रहे, प्रोफेसर का किया ही नहीं. जो प्रोफसर बचे हुए हैं उनमें से कई बहुत अच्छा पढ़ाते हैं, कई राजनीतिक दलों का झोला ढोते हैं और कइयों को पढ़ाने ही नहीं आता है.
जिस मुल्क में किसी को भी वाइस चांसलर बना दिया जाता हो, वहां सिर्फ योग्यता के आधार पर प्रोफेसरों की नियुक्ति का भरोसा इतनी आसानी से पैदा नहीं हो सकता है. कुछ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर पढ़ा रहे हैं, उन्हीं पर बोझ डालने के नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं ताकि नए प्रोफेसर रखने की ज़रूरत न पड़े और जहां ज़रूरत से बचना मुश्किल है, वहां एडहॉक रखने के फैसले हो रहे हैं. हमारे सहयोगी दिनेश मानसेरा ने रिपोर्ट भेजी है कि उत्तराखंड मंत्रिमंडल ने परमानेंट प्रोफसरों की बहाली की जगह ठेके पर लेक्चरर रखे जाने का फैसला किया है. 15 दिन पहले लोक सेवा आयोग को लिखा गया था कि 797 पद भरने की प्रक्रिया शुरू हो मगर 11 अक्टूबर के दिन फैसला पलट गया और अब 585 लेक्चरर ठेके पर रखे जाएंगे.
चार साल से टिन शेड में चल रहा यह कॉलेज उत्तराखंड के चम्पावत ज़िले के बनबसा शहर का है. अस्पताल के स्टॉफ क्वार्टर के कैंपस में टिन शेड के नीचे चल रहा है कॉलेज. कॉलेज के पास न तो अपनी इमारत है न अपना शौचालय. छात्र अस्पताल के शौचालय का ही इस्तमाल करते हैं. इस टिन शेड में छह विषयों की पढ़ाई के लिए पांच टीचर हैं. यह इलाके का एकमात्र कॉलेज है. पढ़ाई कैसे होती होगी इसकी फिक्र न तो पढ़ने वालों को होगी और न पढ़ाने वालों को. कोई सवाल नहीं कर रहा, सब अपना समय काट रहे हैं. इस कॉलेज में सवा सौ छात्र अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं, उनका जीवन कहीं और बर्बाद न हो और उसकी ज़िम्मेदारी किसी और न पर आ जाए, इसलिए सरकार टिन शेड में यह कॉलेज चला रही है. जो छात्र यहां नहीं बर्बाद होना चाहते वो यहां से दूसरे शहर के कॉलेजों में चले गए हैं जहां के कॉलेजों की हालत का अनुमान आप लगा सकते हैं. इसलिए राज्य सरकार ने तय किया है कि जो 585 लेक्चरर ठेके पर रखे जाएंगे उन्हें 500 रुपया प्रति घंटा पर पढ़ाना होगा. वे चाहे कितना भी घंटा पढ़ा लें मगर महीने में उन्हें 25000 से अधिक नहीं मिलेगा. इसे अधिकतम न्यूनतम कहते हैं यानी जो मिनिमम है वही अधिकतम. राज्य में राज मिस्त्री की भी दिहाड़ी 500 है और राजकीय कॉलेज के शिक्षा मिस्त्री की दिहाड़ी भी 500 रुपये हैं. ये उदारवादी सिस्टम का समाजवाद है.
आप भी सोच रहे होंगे कि हम टनकपुर से सटे बनबसा कैसे पहुंच गए, दरअसल फेसबुक पर एक पाठक ने हमें पहुंचा दिया. कई बार लगता है कि समाज ने ही उच्च शिक्षा को छोड़ दिया है. जब लेक्चरर-प्रोफेसर के बग़ैर ही हिन्दुस्तान भर के करोड़ों छात्र पास होते रहे हैं तो क्यों न कॉलेज सिस्टम ही बंद कर दिया जाए और शहर के एक बड़े मैदान में हर महीने की पांच तारीख को जितने छात्र समा जाएं, उन सबको उनकी पसंद के विषय में पास घोषित कर दिया जाए. इससे तो न तो प्रोफेसर रखने का झंझट होगा न ही वाइस चांसलर और शिक्षा मंत्री. हम इस सीरीज़ के दौरान एक ऐसे समाज की हालत देख रहे हैं जो देखी नहीं जा रही है. मगर सोचिए इस हालत को हमारा समाज कितने आराम से देखता आ रहा है. जैसे वो मानता है कि आत्मा भले अमर न हो, कॉलेजों की यह हालत अमर ज़रूर है.
लेकिन फलोदी के जयनारायण मोहन लाल पुरोहित राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय की इमारत बनाने वाले ने ऐसा नहीं सोचा. इस कॉलेज की इमारत तो शानदार है मगर शानदार इमारत में भी हमारी व्यवस्थाएं अपनी निशानी छोड़ देती हैं. मुंबई जाकर कामयाबी हासिल करने वाले हेमचंद पुरोहित को लगा कि उनके इलाके में कॉलेज की अच्छी इमारत होनी चाहिए तो अपनी जेब से 5 करोड़ लगाकर इमारत बना दी. कितने अरमान से उन्होंने पांच करोड़ लगाकर आधुनिक सुविधाओं वाले पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज का निर्माण करा दिया मगर यहां पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं. 16 लेक्चरर-प्रोफेसर होने चाहिए मगर हैं सिर्फ तीन. 27 कर्मचारी होने चाहिए थे मगर 7 ही हैं. 30-30 किलोमीटर से छात्र यहां एमए करने आते हैं. करीब 2000 छात्रों के नामांकन के बाद भी यहां टीचर नहीं है. 1900 छात्रों को एक जगह जमा कर बर्बाद करने का प्रोजेक्ट सरकारें ही चला सकती हैं. 2011 में यह कॉलेज बना कर सरकार को दे दिया गया था.
राजस्थान में एक नए सिस्टम का पता चला है. दूसरे ज़िलों के परमानेंट शिक्षकों में से ही किसी को एक-एक महीने के लिए भेज कर यहां पढ़ाई होती है, कभी नहीं होती है. सोचिए मुंबई के सेठ हेमचंद पुरोहित ने क्या-क्या सपने देखे होंगे जब उन्होंने पांच करोड़ लगाकर यह इमारत बनवाई होगी. वे चाहते तो इतने में अपनी ज़मीन पर कॉलेज बनवाकर मुनाफा कमा सकते थे, मगर ऐसे कम ही होते हैं जो सरकार को इमारत बनवा कर देते हैं. उन्होंने बस इतना चाहा कि उनके पिता का नाम रह जाए इसलिए इस कॉलेज का नाम है हेमचंद जय नारायण पुरोहित महाविद्यालय, अगर सरकार ने भरोसा नहीं तोड़ा होता तो हेमचंद जैसे कितने ही उद्योगपति आगे आते और कॉलेज बना कर अपने ज़िले या गांव के नाम पर दे देते, जैसा कि पहले भी लोग करते रहे हैं. हेमचंद जी न सिर्फ इस कॉलेज के लिए 100 बीघा ज़मीन दान दी, बल्कि दस बीघा ज़मीन में बिल्डिंग बनाकर भी दिया.
राजस्थान से चलते हैं अब झारखंड. रांची यूनिवर्सिटी का हाल लेते हैं. 12 जुलाई, 1960 से रांची यूनिवर्सटी चल रही है. आज इसके तहत 64 कॉलेज हैं. 23 पोस्ट ग्रेजुएट विभाग हैं. दो लाख छात्र हैं, नौजवानों की इतनी जागरूक आबादी जिस यूनिवर्सटी में हो, वहां तो लोकतंत्र और व्यवस्थाओं के चाल-चलन में स्वर्ण युग ही आ जाना चाहिए. मगर रांची यूनिवर्सिटी के छात्र भी, लगता है कि क्लास में प्रोफेसर का नहीं, तीन साल बाद किसी तरह डिग्री का इंतज़ार करते रह जाते हैं.
यहां के खाली पदों पर सीधे बहाली होनी चाहिए थी मगर 1982 के बाद से हुई ही नहीं. आप 21वीं सदी में जा रहे हैं, रांची यूनिवर्सिटी 20वीं सदी में ही फंसी पड़ी है. एसिस्टेंट प्रोफेसर प्रमोशन पाकर एसोसिएट प्रोफसर फिर प्रोफसर बन कर रिटायर होते गए, सीटें खाली होती गईं . यहां कांट्रेक्ट पर टीचर रखे जाते हैं. रिसर्च स्कॉलर क्लास लेते हैं. प्रोफेसरों को प्रशासनिक काम करने होते हैं क्योंकि इन कामों के लिए नॉन टीचिंग स्टाफ की भर्ती नहीं होती है. मुझे इस बात पर शक है कि बहुत से छात्रों को पता है कि उनके प्रोफेसर को पढ़ाने के लिए पढ़ना भी पढ़ता है. न प्रोफेसर बताते हैं और न छात्र पूछते हैं. सबको लगता है कि प्रोफेसर कंप्यूटर हैं, ऑन कर दो, पढ़ाना चालू, इसलिए इनसे एडमिशन भी कराओ, मंत्री का स्वागत भी कराओ और निबंध लेखन प्रतियोगिता का इंचार्ज भी बनाओ.
रांची यूनिवर्सिटी का यह रामलखन सिंह यादव कॉलेज है. कोकर इलाके में यह कॉलेज है, 100 कट्ठा ज़मीन पर बना है. 80 के दशक से ही कॉलेज की ज़मीन को लेकर न्यायिक विवाद चल रहा है. यह कॉलेज हमारी न्यायिक प्रक्रिया की भी मिसाल है. 40 साल में यह मुकदमा अंजाम पर नहीं पहुंचा है. कॉलेज में भी किसी ने सक्रियता नहीं दिखाई. सुप्रीम कोर्ट के स्टे के कारण यहां पर नया निर्माण नहीं हो सकता है. यहां पर इंटर से लेकर ग्रेजुएशन के 9500 छात्र पढ़ते हैं. च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम लागू होने के बाद हर विषय में शिक्षकों की ज़रूरत बढ़ गई है. इस वक्त किसी भी विषय के लिए एक या दो से ज़्यादा लेक्चरर नहीं हैं. नए सिस्टम के हिसाब से इस कॉलेज को 150 के करीब शिक्षक चाहिए मगर पुराने सिस्टम के हिसाब से 38 ही हैं. इतिहास में 300 छात्रों ने एडमिशन लिया है मगर टीचर एक ही हैं. कॉमर्स में आठ सौ छात्र हैं, मगर पढ़ाने के लिए मात्र 3 टीचर हैं. हालत यह है कि शिक्षक क्लास ले या इम्तहान ले या कापी चेक करे. तीन-तीन, चार-चार महीना परीक्षा होती है और फिर कापी चेक होती हैं. शिक्षक कहते हैं कि फिर भी हम लोग पढ़ा लेते हैं, मगर आप समझ सकते हैं कि क्या पढ़ाई होती होगी.
इस कॉलेज में रांची के आस-पास के ग्रामीण इलाके से बच्चे पढ़ने आते हैं. एक छात्र तो यहां 40 किमी से रोज़ साइकिल चलाकर आता है मगर सिस्टम उसे रोज़ फेल करता होगा. एक शिक्षक ने बताया कि इस दबाव से निपटने के लिए हमने खास तरह से रूटीन बनाया है ताकि किसी वक्त एक हज़ार से अधिक छात्र कैंपस में न हो. आईआईएम अहमबादाबाद के प्रोफेसर को रामलखन सिंह यादव कॉलेज पर एक अध्ययन करना चाहिए. यह कॉलेज मुख्यमंत्री के आवास से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर है मगर सरकार की निगाह से एक लाख प्रकाश वर्ष दूर है. रामलखन सिंह यादव बिहार के दबंग नेता हुए थे, इनके नाम पर कई जगहों पर कॉलेज है.
हमारे मुल्क में मात्र 200 करोड़ की मूर्ति बनाने पर विवाद हो गया. इसका मुझे दुख है. मांग यह होनी चाहिए था कि राम की मूर्ति बन रही है तो 200 की जगह 20,000 करोड़ की लागत से बननी चाहिए. ताकि दुनिया को पता चले कि हम भारत के नौजवानों के लिए कॉलेज भले न बना सके, जो बने हुए हैं, उन्हें भले न बचा सके, मगर मूर्ति हम चाह लें तो बनाकर रहेंगे. हमारे युवा अब क्लास रूप में पढ़कर पास नहीं होंगे, वे टीवी चैनल के सामने इन विषयों पर डिबेट देखते हुए एजुकेटेड हो रहे हैं. रामलखन सिंह यादव कॉलेज के प्रिंसिपल साहब की बात सही है, आखिर वे क्या कर सकते हैं, जब कोई कुछ कर ही नहीं रहा है वे क्या कर सकते हैं.
हमारे सहयोगी हरबंस और मनोज ने दुमका के एक कॉलेज का हाल भेजा है. ये एक अलग यूनिवर्सिटी है. सिदो कान्हु मुर्मू यूनिवर्सिटी. इस यूनिवर्सिटी में दुमका, देवघर, गोड्डा, जामताड़ा, पाकुड़और साहेबगंज के 13 महाविद्यालय आते हैं.
1855 में सिदो कान्हु ने अंग्रेज़ी हुकूमत और साहूकारों के अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की थी. 30 जून, 1855 की रात साहेबगंज ज़िला के भोगनडील गांव में 10 हज़ार से अधिक संथाल जमा हुए थे. सिदो मुर्मू और कान्हु मूर्मु ने उस रात आज़ादी का ऐलान कर दिया. इनकी ज़ुड़वां बहनें चांद और भैरव भी शहीद हो गई थीं. 1857 से पहले का यह संथाल विद्रोह इतिहास का एक निर्णायक पन्ना है. चार भाई-बहनों के शहीद होने का किस्सा काश ज़माने तक पहुंचता मगर सिदो और कान्हु के नाम पर बनी यूनिवर्सिटी की हालत भी ठीक नहीं है. इस यूनिवर्सिटी में 55 हज़ार छात्रों का भविष्य उज्जवल होने का इंतज़ार कर रहा है. इस यूनिवर्सटी में 476 अस्सिटेंट प्रोफेसर होने चाहिए मगर 288 ही हैं. 188 पद रिक्त हैं. रीडर के 34 पद होने चाहिए मगर एक भी रीडर नहीं है. यहां के 13 महाविद्यालयों में से सिर्फ एक के पास प्रिंसिपल होने का सौभाग्य प्राप्त हैं. बाकी 12 कॉलेज में प्रिंसिपल भी नहीं हैं.
छात्र और छात्राओं को एक बात समझ आ गई है. यूनिवर्सिटी का मतलब परीक्षा देना और पास कर जाना है. इस सीरीज़ के दौरान कई जगहों के छात्रों और प्रोफसरों ने फोन पर बताया कि एक ही काम है जो चल रहा है. इम्तहान का फार्म भराना और इम्तहान कराना. इसके अलावा सब काम बंद हैं. हर कॉलेज में प्रिंसिपल और यूनिवर्सिटी में वीसी का कमरा और आफिस चमकता हुआ मिलेगा. वहां गमले ज़रूर मिलेंगे. पढ़ाई बर्बाद कर, पर्यावरण की रक्षा करते हुए. शिक्षक जानते हैं कि हकीकत क्या है, इसलिए दावा भी नहीं कर पाते हैं. यह बात सही है. जब पढ़ाने वाला होगा ही नहीं तो जो बचा हुआ है वो कैसे सारा पढ़ा देगा.
झारखंड के दो विश्वविद्यालयों का हाल हमने देखा. अब उत्तरी छोटानागपुर के विनोबा भावे यूनिवर्सिटी का हाल बताते हुए गर्व सा महसूस हो रहा है. यही कि हमारे आज के नेताओं ने याद करने के मामले में किसी भी नेता को नहीं छोड़ा. जिसे भी याद किया है उनकी निशानी देखकर याद के नाम से ही रूह कांप उठती है. अब कुछ हो किसी की स्मृति में कुछ भी न बने.
इस यूनिवर्सिटी में भी 70 प्रतिशत शिक्षकों की कमी बताई जा रही है. मात्र 30 प्रतिशत बचे हुए शिक्षकों के भरोसे यह यूनिवर्सिटी टल रही है. छात्र शिकायत करते हैं, शिकायत सुन ली जाती है. हमारे देश में कार्रवाई भले न हो, सुनवाई हो जाती है. अब तो बहुत से लोग सुनवाई को ही कार्रवाई समझ कर अपना धरना अगले धरने तक के लिए स्थगित कर देते हैं. जो शिक्षक बचे हुए हैं उन्हें कॉलेज के प्रशासन का काम भी करना होता है. पढ़ाई का काम भले ही रुक जाए, प्रशासन का काम नहीं रुकना चाहिए. भारत की जनता इसी यकीन में सोती है कि शासन का प्रशासन चल रहा है. बाकी अस्पताल, स्कूल चले न चले, क्या फर्क पड़ता है. यूनिवर्सिटी में अब इस बात को लेकर उम्मीद जगी है कि 9 साल बाद प्रोफेसरों की बहाली की कवायद शुरू हो रही है. किसी को पता नहीं कि क्या 70 फीसदी बहाली होगी, मगर बहाली होने जा रही है यही सुनकर उम्मीदों के बादल छा गए हैं. प्रोफेसर के आने का अनुमान मौसम विभाग के अनुमान जैसा हो गया हैं.
भारत दुनिया का अकेला देश होगा जहां नहीं पढ़ाने के लिए इतने कॉलेज खोले गए हैं. इस हालात में आपको रेटिंग नाम के झुंझने से धोखा दिया जाता है कि भारत में भी दुनिया की तरह रेटिंग शुरू हो गई है. अब कॉलेजों की रैंकिंग होगी. इस सीरीज़ के दौरान यह भी समझ आ रहा है कि कॉलेजों की ग्रेडिंग के लिए नेशनल एक्रिडेशन काउंसिल (नैक) का सिस्टम भी नाकाफी और नाकाम है.
सूरत की एक शिक्षिका ने कहा कि हमारे शहर में नैक की टीम आती है तो उन्हें साड़ी और मिठाई का डिब्बा देकर भेजना होता है. कई जगहों पर नैक की टीम अच्छा काम भी कर जाती है. पर नैक और रेटिंग से क्या होगा, क्या आपको पता चलेगा कि फलां कॉलेज में 70 फीसदी प्रोफेसर नहीं हैं. हज़ार से लेकर दस दस हज़ार छात्रों का भविष्य एडमिशन फीस लेकर बर्बाद किया जा रहा है. मगर यह मसला ज़रूरी नहीं है. मूर्ति बननी चाहिए. सुना है नेता लोग ज़हर पीने लगे हैं. भारत के लाखों-करोड़ों छात्रों ने यूनिवर्सिटी में जाकर जो अमृत पिया है, उसने हमारी व्यवस्थाओं के साहस को अमर कर दिया है और छात्रों को जर्जर. यह पंक्ति तभी समझ आएगी जब आप इसे चार बार पढ़ेंगे और पांच बार सुनेंगे.
यूनिवर्सटी के शिक्षकों के लिए एक खुशी की खबर है. ऐसा नहीं है कि ख़राब सिस्टम में खुशियां नहीं आती हैं. आती हैं और आती रहेंगी. प्रोफेसरों के जीवन में सातवें वेतन आयोग का आगमन हुआ है, बधाई. सेंट्रेल यूनिवर्सिटी, स्टेट यूनिवर्सटी और एडेड कॉलेज के शिक्षकों का वेतन बढ़ा है. इस घोषणा से पता चला कि भारत में 7 लाख, 58 हज़ार प्रोफेसर हैं. काश यह भी पता चल जाता कि भारत में कितने लाख प्रोफेसर नहीं हैं.
सैलरी ज़रूरी है, क्योंकि जो बचे हुए प्रोफेसर-लेक्चरर हैं, पढ़ाने के लिए काफी मेहनत करते हैं, खासकर हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी में तो देखा है, हमारे टीचर हमें पढ़ाने के लिए घर पर 5-5 घंटे रोज़ पढ़ कर आते थे. तब हमें पहली बार पता चला था कि पढ़ाने के लिए पढ़ना भी पड़ता है. जो नहीं पढ़ाते हैं वो प्रिंसिपल या सत्तारूढ़ दल का ज़रूरी काम करते हैं. वो भी राष्ट्र निर्माण का ही काम है. छात्र निर्माण से भी बड़ा काम है राष्ट्र निर्माण. उम्मीद है ख़ाली पदों पर भी एक प्रेस कांफ्रेंस होगी. जिसमें बताया जाएगा कि बहाली की प्रक्रिया कैसे पारदर्शी होगी. सत्तारूढ़ दल का झोला उठाने वालों की नहीं, पढ़ने वालों को नौकरी मिलेगी.
जिन स्कूलों ने नहीं भरा यू डायस, अब कर रहे आवेदन
सरकारीऔर निजी स्कूलों में कार्यरत अप्रशिक्षित शिक्षकों के लिए डीएलएड
(डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन) प्रशिक्षण प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया
गया है। ऐसे स्कूलों के बारे में भी शिक्षा विभाग को पता चलने लगा है, जो
कभी यू-डायस भरने में दिलचस्पी ही नहीं लेते थे।
रांची में पारा शिक्षक संघ की बैठक आठ अक्टूबर को
जयनगर | 15अक्टूबर को झारखंड राज्य सहयोगी शिक्षा मित्र पारा शिक्षक संघ के
प्रदेश का चुनाव की तैयारी को लेकर 8 अक्टूबर को रांची मोरहाबादी मैदान के
दादा-दादी पार्क में पूर्वाह्न 11 बजे से एक बैठक आहूत की गई है।
झारखंड में हाईस्कूल शिक्षक के लिए आपने किया है आवेदन, तो जरूर पढ़िये ये खबर, कहीं आपका आवेदन रद्द तो नहीं हो गया !
आपने झारखंड में हाईस्कूल शिक्षक के लिए आवेदन किया है, तो यह खबर आपको जरूर पढ़नी चाहिए. कहीं आवेदन करने में लापरवाही के कारण आपका आवेदन रद्द तो नहीं कर दिया गया !
भारी-भरकम पैरवी वाले 19 शिक्षकों का हुआ स्थानांतरण
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : राज्य के शिक्षा विभाग द्वारा प्रस्तावित
नई स्थानांतरण नीति के बावजूद जिले के 19 शिक्षकों का विभिन्न कारण दिखाकर
स्थानांतरण एवं पदस्थापन किया गया है।
स्थानांतरित किए गए 15 शिक्षक पैरवी से फिर जमशेदपुर गए
एजुकेशन रिपोर्टर | जमशेदपुर शिक्षकस्थानांतरण में एक बार फिर पैसे-पैरवी का खेल चला है। इसका
उदाहरण है- जिला शिक्षा विभाग द्वारा 19 शिक्षकों का हालिया स्थानांतरण।
विभाग की ओर से जिन 19 शिक्षकों का स्थानांतरण किया गया है,
शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति के लिए 10 तक मांगी सूची
जिलाशिक्षा पदाधिकारी प्रदीप कुमार चौबे द्वारा उत्क्रमित विद्यालय के
प्रधानाध्यापकों की बैठक एसपीजी मिशन उच्च विद्यालय में हुई। इसमें
शिक्षकों की कमी वाले विद्यालय में प्रतिनियुक्ति के लिए प्रधानाध्यापक
70 वर्षों से देश में बेहतर शिक्षा नीति नहीं बन पाई : महेंद्र कपूर
राष्ट्रीयशैक्षिक महासंघ झारखंड का सातवां प्रांतीय अधिवेशन बंदगांव के
करंजो स्थित सिदो-कान्हू शिक्षा निकेतन में शनिवार से शुरू हुआ। इस अधिवेशन
की शुरुआत शैक्षिक संघ के केंद्रीय नेताओं ने भारत माता की तस्वीर पर दीप
प्रज्ज्वलित कर किया।
पारा शिक्षक संघ का 14 को सम्मेलन
धनबाद| झारखंड प्रदेशपारा शिक्षक महासंघ धनबाद इकाई की बैठक संघ भवन हीरापुर
में जिला अध्यक्ष अश्विनी कुमार सिंह की अध्यक्षता में हुई।
सीमित संसाधन में दें बेहतर रिजल्ट : डीइओ
गिरिडीह : माध्यमिक शिक्षकों का दस दिवसीय सेवाकालीन प्रशिक्षण सर
जेसी बोस बालिका उच्च विद्यालय के सभागार में शनिवार से शुरू हुआ. मुख्य
अतिथि जिला शिक्षा पदाधिकारी निर्मला कुमारी बरेलिया ने दीप प्रज्वलित कर
प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया.
एक शिक्षक के भरोसे 508 बच्चे
उच्च विद्यालय कुबरी. अपने स्वर्णिम अतीत पर बहा रहा आंसू
जिस स्कूल से पढ़ कर चंदननगर के बलदेव राम बिहार में आइजी बने, गुंडरी
के बलदेव राम बोकारो में डीडीसी रहे, बरवाडीह के सतेंद्र सिंह कोल्हान
विश्व विद्यालय में कुलपति पद को सुशोभित कर रहे हैं, वह कुबरी उच्च
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