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अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों का वेतन अब भौतिक सत्यापन में फंसा

रांची सहित राज्य के अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों का वेतन अब भौतिक सत्यापन के फेर में फंस गया है। इस मामले में 28 जुलाई को माध्यमिक शिक्षा निदेशक मनोज कुमार ने राज्य के सभी उपायुक्तों को पत्र भेजकर एक सप्ताह के अंदर सभी स्कूलों का भौतिक सत्यापन कर जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराने को कहा था।
इस पत्र में कहा गया था कि विद्यालयों में कार्यरत कर्मियों के स्थापना व्यय के लिए राशि स्वीकृति से पूर्व स्कूलों का भौतिक सत्यापन का निर्देश विभागीय मंत्री ने दिया है।

भौतिक सत्यापन के क्रम में इस पर ध्यान दिया जाए कि विद्यालय मानकों को पालन कर रहे हैं कि नहीं? इसके अलावा जांच में अनुमंडल पदाधिकारी से नीचे स्तर के पदाधिकारी को शामिल नहीं करने को कहा गया था। अल्पसंख्यक स्कूलों के कर्मियों के वेतन का मामला डीबी स्टार ने 27 जुलाई के अंक में चार महीने से अल्पसंख्यक स्कूलों के शिक्षकों को नहीं मिल रहा वेतन, कर्ज लेकर परिवार पालने को मजबूर शीर्षक से उठाया था।

इसमें बताया गया था कि राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक विद्यालयों के लिए एक अरब 23 करोड़ 37 लाख 12 हजार रुपए बजट में प्रावधान किया है। लेकिन विभागीय सुस्ती के कारण आवंटन जारी नहीं किया गया है। इस कारण रांची जिले के 28 अल्पसंख्यक स्कूलों में 500 से अधिक और राज्य में 131 स्कूलों के कुल 2300 शिक्षक-कर्मचारियों को मार्च महीने से वेतन नहीं मिल रहा है। खबर प्रकाशित होने के दूसरे दिन 28 जुलाई को माध्यमिक शिक्षा निदेशक की ओर से राज्य के सभी उपायुक्तों को पत्र भेजा गया।

मैं अभी वेरिफाई करा लेता हूं

जिससंचिका से भौतिक सत्यापन के लिए पत्र निर्गत हुआ था, वह अभी मेरे पास आई नहीं है। हो सकता है जिलावार डीसी द्वारा रिपोर्ट भेजी गई हो। मैं इसका वेरिफाई करा लेता हूं। मनोजकुमार, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा, झारखंड

एक सप्ताह का समय भी बीत गया

अल्पसंख्यकविद्यालयों के शिक्षकों और कर्मियों को उम्मीद थी कि एक सप्ताह के बाद आवंटन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। लेकिन अभी तक सभी जिलों से जांच प्रतिवेदन नहीं आया है। इस संबंध में झारखंड राज्य माध्यमिक शिक्षक संघ के संयुक्त सचिव यशवंत विजय का कहना है कि जांच कराना अच्छी बात है। लेकिन एक सप्ताह की मियाद पूरी हो चुकी है। अगर उपायुक्त छह महीने में जांच रिपोर्ट नहीं सौंपते हैं तो क्या हमें वेतन नहीं मिलेगा? 2300 से अधिक लोग परेशान हैं, लेकिन अधिकारियों को इससे कोई मतलब नहीं।

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