Ranchi: झारखंड में बहुमत वाली बीजेपी सरकार के 12
सांसद हैं. राजमहल और दुमका लोकसभा को छोड़ दी जाए तो, पूरा झारखंड भगवा
नजर आता है. अमित शाह की रणनीति है कि इस लोसकभा चुनाव में बीजेपी क्लीन
स्वीप करे. लेकिन बीते चार साल में सूबे में सरकार की 10 नीतियों की वजह से
लोकसभा चुनाव पर असर पड़ता दिखायी दे रहा है. पिछली बार की तरह इस बार भी
लोकसभा चुनाव में मोदी ही चेहरा हैं.
लेकिन जानकारों का मानना है कि इस बार तस्वीर बदल सकती है. आखिर क्या हैं वो दस वजह जो लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बट्टा लगाने का काम कर सकती है. जानते हैं…
हर
खनिज संपदा से संपन्न झारखंड में बिजली की घोर समस्या है. यहां की बिजली
से दूसरे राज्यों में रौशनी है और झारखंड अंधेरे में डूबा है. राजधानी
रांची की हालत यह है कि यहां किसी तरह 10 घंटे ही बिजली रह रही है. बिजली
की समस्या से कारोबारी से लेकर आमजन जूझ रहा है. समस्या के पीछे सीधे तौर
से सरकार की नीति जिम्मेवार है.
लेकिन जानकारों का मानना है कि इस बार तस्वीर बदल सकती है. आखिर क्या हैं वो दस वजह जो लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बट्टा लगाने का काम कर सकती है. जानते हैं…
सरकार से है सांसदों की नाराजगी
सांसदों की नाराजगी मौजूदा सरकार से अभी की बात नहीं है. अंदर ही अंदर कई मामलों को लेकर सांसद रघुवर सरकार का विरोध करते आए हैं. अब जब चुनाव नजदीक आ गया है, तो सांसद खुल कर सामने आ रहे हैं. हाल ही में मीडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, सांसद रामटहल चौधरी सरकार की स्थानीय नीति को लेकर सरकार का विरोध कर रहे हैं. सांसद कड़िया मुंडा का कहना है कि सरकार का जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच संवादहीनता की स्थिति है. सांसद पशुपतिनाथ सिंह का कहना है कि सरकार ने कई काम किए हैं, लेकिन अभी भी कई तरह की कमियां हैं. उन्हें दूर करने की जरूरत है. सांसद रविंद्र पांडे और रविंद्र राय ने सरकार की स्कूल मर्जर की योजना का विरोध किया है. रविंद्र पांडे का कहना है कि हमें यह पता लगाना चाहिए कि जिन स्कूलों का मर्जर हुआ है, उसके बच्चे कहां गए. वहीं रविंद्र राय का कहना है कि उन्होंने स्कूल मर्ज होते हुए अपनी लाइफ में पहली बार ही देखा है.विधायकों की नहीं चलती, मंत्री भी बेबस
2014 चुनाव के बाद रघुवर सरकार में शायद ही कोई मंत्री या विधायक हो, जो दावे का साथ अपने वोटरों से कुछ वादा कर सके. सभी के मन में हर वक्त संकोच रहता है कि किया हुआ वादा सरकार की तरफ से वो पूरा कर पाएंगे या नहीं. यहां तक कि मंत्रीपरिषद की बैठकों में विभाग के मंत्री को कभी-कभी यह पता नहीं होता है कि उनके विभाग में क्या फेरबदल होने वाला है. कहा जाए तो सारे मंत्री इस सरकार में विभाग में बस विभाग प्रमुख होने का काम कर रहे हैं. जबकि फैसला सीएम के स्तर से होता है. ऐसे में चुनाव में मंत्री और विधायकों का गुस्सा सरकार के लिए लाजिमी है.पार्टी कार्यकर्ता और बड़े नेताओं का हाशिए पर जाना
बीजेपी की बीट कवर करने वाले पत्रकारों से ज्यादा इस बात को कोई नहीं समझ सकता है कि मौजूदा सरकार को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच कितना आक्रोश है. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपनी छवि इस तरह डेवलप की कि दूसरा कोई नेता बड़ा होकर भी बड़ा बन नहीं सका. पार्टी के जितने भी बड़े नेता हैं, अगर वो रघुवर दास के फोल्डर के नहीं हैं तो वो अपने-आप को हाशिए पर पा रहे हैं. मौन रखना उनकी नैतिक जिम्मेदारी हो गयी है.पारा शिक्षक एक बड़ा मामला
स्थापना दिवस के दिन जिस तरीके एक तरफ सीएम का भाषण चल रहा था और दूसरी तरफ पारा शिक्षकों को पीटा जा रहा था, उससे पारा शिक्षकों में काफी आक्रोश है. उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. सार्वजनिक रूप से सीएम ने एक आयोजन में कहा कि इतनी धाराएं लादेंगे कि पारा शिक्षक जेल से छूट कर वापस नहीं आएंगे. इन बातों से पारा शिक्षकों के साथ अल्पवेतन भोगियों में सरकार को लेकर काफी आक्रोश है. हालांकि पारा शिक्षक मामले में सराकर अब बैकफुट पर है. शिक्षकों को बेल मिल रहा है और सरकार की तरफ से उनके मानदेय में भी बढ़ोतरी की गयी है.पुलिस वालों से वादा कर भूल जाती है सरकार
15 मई 2016 में बोकारो जिले में नवाडीह थाना प्रभारी रामचंद्र राम की मौत के बाद जिस तरीके से सीएम ने पुलिसवालों के लिए घोषणा की थी. उससे पुलिस महकमे में काफी खुशी थी. सीएम ने कहा था कि विधि व्यवस्था संभालते हुए भी अगर पुलिस की जान जाती है तो उसे नक्सली हिंसा में मारे गए पुलिस कर्मियों की तरह मुआवजा और सुविधाएं मिलेंगी. लेकिन वादा करने का बाद रघुवर सरकार भूल गयी. इससे पुलिस महकमे में काफी आक्रोश है. इस घोषणा के अलावा और भी कई वादे थे जो सरकार ने पुलिस वालों के लिए की थी और वो पूरे नहीं हुए.बिजली की स्थिति से कारोबारी और जनता परेशान
