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शिक्षा विभाग में गलत प्रमाणपत्रों पर हुई अनुकंपा पर बहाली की अनुशंसा

देवघर विद्यापीठ के प्रमाणपत्रों पर प्रोन्नति या नियुक्ति नहीं हो सकती है। सरकार ने संस्थान और प्रमाणपत्र की भी मान्यता खत्म कर दी है। बावजूद उसी प्रमाणपत्र पर अनुकंपा पर नियुक्ति के लिए अनुशंसा कर दी गई। डीएसई कार्यालय में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है।
पहले देवघर विद्यापीठ और अब इंदिरा गांधी हायर सेकेंडरी एंड ओपन एजुकेशन। तत्कालीन डीएसई के बाद अनुकंपा समिति की भी नजर इस पर नहीं पड़ी और वहां भी नियुक्ति की अनुशंसा कर दी गई। यह दोनों प्रमाणपत्र डीएसई कार्यालय, धनबाद के भूतपूर्व लिपिक स्व भूपेंद्र मांझी की प|ी बुधनी देवी ने चतुर्थ वर्ग के पद पर नियुक्ति के लिए दिए थे। अधिकारी बदलते गए, लेकिन अमान्य प्रमाणपत्रों के साथ अनुशंसा होती रही। यही नहीं आवेदिका के प्रमाणपत्र भी अब बदल दिए गए हैं। बुधनी देवी ने वर्ष 2014 में हिंदी विद्यापीठ देवघर की प्रवेशिका परीक्षा के प्रमाणपत्र दिए थे, जिसके आधार पर अनुकंपा समिति ने अनुशंसा की थी। लेकिन अब नियुक्ति के लिए डीईओ के पास इंदिरा गांधी हायर सेकेंडरी एंड ओपन एजुकेशन के प्रमाणपत्र दिए हैं।

बदले गया प्रमाणपत्र भी मान्य नहीं : इंदिरा गांधी हायर सेकेंडरी एंड ओपन एजुकेशन पश्चिम बंगाल की संस्था है, जो माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तरप्रदेश एवं दिल्ली से संबद्ध है। माध्यमिक शिक्षा परिषद ही गैर मान्यता प्राप्त बोर्ड/विश्वविद्यालय की सूची में शामिल है। ऐसे में इससे संबद्ध संस्था से जारी प्रमाणपत्र कैसे मान्य हो सकते हैं। हिंदी विद्यापीठ देवघर के प्रमाणपत्र होने के कारण ही पहले आरडीडीई ने फाइल लौटा दी थी।

साल 2014 में हुई थी अनुकंपा समिति की बैठक

16 अक्टूबर 2014 को जिला अनुकंपा समिति की बैठक हुई थी। इसमें बुधनी देवी के मामले की भी स्वीकृति हुई थी, जिसके साथ देवघर विद्यापीठ के प्रमाणपत्र थे। जबकि कार्मिक विभाग ने आदेश जारी कर 26 जून 2014 के प्रभाव से विद्यापीठ की मान्यता समाप्त कर दी थी. साथ ही हिंदी विद्यापीठ देवघर से 26 जून 2014 से पहले जारी सभी प्रमाण पत्रों की मान्यता भी रद्द कर दी थी। इस तरह कार्मिक विभाग के आदेश का उल्लंघन साफ दिखता है।

डीएसई ने की थी अनुशंसा

बुधनी देवी की नियुक्ति की अनुशंसा डीएसई बांके बिहारी सिंह ने की थी। इसका उल्लेख अनुकंपा समिति की बैठक की कार्यवाही में भी है। यानी अनुकंपा समिति से पहले भी नियम टूटे। देवघर विद्यापीठ के प्रमाणपत्र पर फाइल बढ़ा दी गई। तीन वर्षों बाद 8 जुलाई 2017 को डीएसई ने ज्ञापांक 858 (वर्ष 2014) का हवाला देकर फाइल डीईओ के पास भेजी थी।

नियुक्ति के समय देवघर विद्यापीठ के प्रमाणपत्र मान्य थे। प्रक्रिया के दौरान प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित किया गया। अब जो प्रमाणपत्र मिला है, उसकी इंटरनेट से जांच की जाएगी। उसके सही पाए जाने पर ही नियुक्ति होगी।’’ विनीत कुमार, डीएसई, धनबाद

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