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फिर हुआ बजट का 15 हजार करोड़ रुपये सरेंडर

झारखंड की रघुवर सरकार ने बजट की राशि को खर्च करने के लिए वित्तीय प्रबंधन को लागू करने का दावा किया था. लेकिन इस वित्तीय वर्ष में भी स्थिति पहले के सालों की तरह रही. लगभग 15 हजार करोड़ से अधिक की राशि सरेंडर कर दी गई. कई विभागों की राशि को पीएल एकाउंट में रख दिया गया.


रघुवर सरकार जनता के लिए बजट पेश करने का दावा करती रही है, वैसे बजट जनता के लिए ही होता है इसके लिए कड़े वित्तीय प्रबंधन लागू किये गए. सालाना बजट को जनवरी में विधानसभा में पेश किया जाने लगा. वित्तीय वर्ष 2017-18 का भी बजट जनवरी में पेश किया गया. इसको लेकर तर्क यह था कि बजट की औपचारिकताएं समय रहते पूरी कर ली जाएगी. ताकि बजट पर काम अप्रैल से शुरू हो जाए, लेकिन इसका लाभ होता नहीं दिख रहा है.

बजट के जानकार बताते हैं कि 75,673 करोड़ रुपये के सालाना बजट और तीन अनुपूरक की राशि मिलाकर कुल 81 हजार करोड़ रुपये से अधिक का बजट हो गया था. लेकिन लाख कोशिश के बावजूद स्थिति इस साल भी ऐसी ही है.

रघुवर सरकार ने एक साल में विभागों के खर्च की स्थिति ऐसी थी- कृषि,पशुपालन विभाग-45 प्रतिशत,  भवन निर्माण विभाग-95 प्रतिशत, परिवहन विभाग -95 प्रतिशत, ऊर्जा विभाग-94 प्रतिशत, स्वास्थ्य विभाग-85 प्रतिशत, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग-97 प्रतिशत, शिक्षा विभाग-80 प्रतिशत, कल्याण विभाग-60 प्रतिशत, ग्रामीण विकास विभाग-65 प्रतिशत, नगर विकास विभाग-91 प्रतिशत, जल संसाधन विभाग-79 प्रतिशत.

राजस्व प्राप्ति की स्थिति- वाणिज्य कर -लक्ष्य  15500 करोड़ - वसूली 9600 करोड़ रु, खान -लक्ष्य 8508 करोड़ -वसूली 5485 करोड़ रु, उत्पाद -लक्ष्य 1600 करोड़ - वसूली 825 करोड़ रु, परिवहन -लक्ष्य 1500 करोड़ -वसूली 780 करोड़ रु, निबंधन -लक्ष्य 900 करोड़ -वसूली 446 करोड़ रु, भू राजस्व -लक्ष्य 400 करोड़ -वसूली 101 करोड़ रु.

उल्लेखनीय है कि सरकार की नीतियों के कारण निबंधन का राजस्व लगभग आधा हो गया है. महिलाओं को 1 रुपये में रजिस्ट्री की सुविधा दने की योजना ने प्रतिकूल प्रभाव डाला है. इसके अलावे शराब बेचने की अपनी व्यवस्था ने भी राजस्व का नुकसान कराया है.

एक बड़ी कर राशि सरेंडर होने के संबंध में सरकार के मंत्री सीपी सिंह कहते हैं कि पैसा बर्बाद करना उद्देश्य नहीं है, बल्कि उसका उपयोग होना चाहिए.

वैसे जानकारी के अनुसार पिछले कुछ दिनों में पथ निर्माण समेत कुछ विभागों ने लगभग 5 सौ करोड़ रुपये खर्च किये हैं. कई विभागों की राशि को पीएल एकाउंट में रखा गया है. बहरहाल, लाख प्रयास के बाद भी वित्तीय प्रबंधन और अनुशासन की समस्या 2017-18 के बजट में भी दिखा.

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